पांच साल में 12 तबादले…अब 17 न्यायिक अधिकारियों ने अलग-अलग मामलों की सुनवाई से खुद को किया अलग, जानिए कौन हैं IFS संजीव चतुर्वेदी

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Sanjeev-Chaturvedi

Uttarakhand | Sanjeev Chaturvedi | IFS Case : उत्तराखंड कैडर के चर्चित भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। उनके अलग-अलग मामलों की सुनवाई से अब तक 17 न्यायिक अधिकारी स्वयं को अलग कर चुके हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश, उत्तराखंड हाई कोर्ट के चार न्यायाधीश, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT के नौ न्यायिक सदस्य और जिला न्यायपालिका के दो न्यायाधीश शामिल बताए गए हैं।

हालिया मामला CAT की दिल्ली पीठ से जुड़ा है। 21 सितंबर 2026 को न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने संजीव चतुर्वेदी की एक याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। इस याचिका में उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के उस आदेश को चुनौती दी गई है….जो भारतीय वन सेवा अधिकारियों की मूल्यांकन रिपोर्ट यानी APAR के रिपोर्टिंग चैनल से संबंधित है। आदेश में सुनवाई से अलग होने की कोई विशेष वजह दर्ज नहीं की गई।

क्या है APAR से जुड़ा विवाद?

मामला उत्तराखंड में भारतीय वन सेवा अधिकारियों की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट यानी APAR की प्रक्रिया से जुड़ा है। संजीव चतुर्वेदी ने नवंबर 2021 में जारी उत्तराखंड सरकार के आदेश को चुनौती दी है। इसी मामले में CAT दिल्ली पीठ के न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने सुनवाई से खुद को अलग किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक चतुर्वेदी ने इस मामले में अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों की APAR से संबंधित नियमों और सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के फैसले का हवाला दिया था। CAT के आदेश में यह भी दर्ज है कि चतुर्वेदी स्वयं मामले की पैरवी कर रहे थे।

17 न्यायिक अधिकारियों के अलग होने की बात क्यों चर्चा में?

संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मामलों में पिछले करीब 13 वर्षों के दौरान कई न्यायाधीशों ने खुद को सुनवाई से अलग किया है। इन मामलों की प्रकृति भी अलग-अलग रही है। इनमें सेवा संबंधी मामले, प्रतिनियुक्ति, मूल्यांकन रिपोर्ट, कथित भ्रष्टाचार की जांच से जुड़े दस्तावेज और अन्य न्यायिक कार्यवाही शामिल हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इन 17 मामलों को एक ही मुकदमे का हिस्सा नहीं माना जा सकता। अलग-अलग समय पर अलग-अलग अदालतों और न्यायाधिकरणों में अलग मामले चले हैं। कई मामलों में न्यायाधीशों के अलग होने के आदेश में इसकी वजह भी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं की गई।

सुप्रीम कोर्ट से भी जुड़े मामले

संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोगोई और यूयू ललित के भी सुनवाई से अलग होने का उल्लेख मिलता है।

नवंबर 2013 में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने चतुर्वेदी की उस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग किया था….जिसमें हरियाणा में उनके कार्यकाल के दौरान सामने आए कथित भ्रष्टाचार के मामलों और उनसे जुड़े उत्पीड़न की सीबीआई जांच की मांग की गई थी। इसके बाद अगस्त 2016 में तत्कालीन न्यायमूर्ति यूयू ललित भी संबंधित कार्यवाही से अलग हुए थे।

उत्तराखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश भी अलग हुए

उत्तराखंड हाई कोर्ट में भी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मामलों की सुनवाई से न्यायाधीशों के अलग होने के मामले सामने आए हैं।

मई 2023 में न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल एक ऐसे मामले की सुनवाई से अलग हुए थे…जिसमें चतुर्वेदी के एम्स में मुख्य सतर्कता अधिकारी रहते हुए की गई भ्रष्टाचार विरोधी जांच से जुड़े दस्तावेजों का मामला था।

फरवरी 2024 में न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने उनकी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में सुनवाई से खुद को अलग किया। इसके बाद सितंबर और अक्टूबर 2025 में न्यायमूर्ति आलोक वर्मा और न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी भी एक अवमानना मामले की सुनवाई से अलग हुए।

CAT में भी कई मामले

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT में भी चतुर्वेदी से जुड़े कई मामलों में न्यायिक सदस्यों के सुनवाई से अलग होने के मामले सामने आए हैं।

फरवरी 2025 में हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद की पीठ ने ऐसे मामले से खुद को अलग किया था….जो एम्स में चतुर्वेदी की मूल्यांकन रिपोर्ट को डाउनग्रेड किए जाने से संबंधित था। इसके अलावा CAT में इससे पहले भी अलग-अलग मामलों में कई न्यायिक सदस्यों के recusal का उल्लेख मिलता है।

कौन हैं संजीव चतुर्वेदी?

संजीव चतुर्वेदी 2002 बैच के भारतीय वन सेवा अधिकारी हैं और हरियाणा कैडर से सेवा शुरू करने के बाद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति तथा उत्तराखंड में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वह एम्स दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी यानी CVO के तौर पर भी काम कर चुके हैं।

उनके एम्स कार्यकाल को भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच के लिए विशेष रूप से चर्चा में रखा गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने वहां बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की और कई मामलों में कार्रवाई आगे बढ़ाई। Business Standard की एक रिपोर्ट के मुताबिक CVO के तौर पर करीब ढाई साल में उन्होंने 165 मामलों में जांच और कार्रवाई पूरी की थी।

हरियाणा में भी उठाए थे भ्रष्टाचार के मामले

संजीव चतुर्वेदी के करियर में हरियाणा का कार्यकाल भी महत्वपूर्ण रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने वन विभाग से जुड़े कई मामलों में अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाए थे। उनके काम को लेकर उन्हें कई तबादलों का सामना करना पड़ा।

एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2010 के बीच पांच वर्षों में उनका 12 बार तबादला हुआ था। उनके कार्यकाल में वन विभाग से जुड़े कुछ मामलों की जांच और कार्रवाई भी चर्चा में रही।

एम्स मामले में भी लंबी कानूनी लड़ाई

एम्स में CVO रहते हुए संजीव चतुर्वेदी की ओर से भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच किए जाने के बाद उनके सेवा संबंधी मामलों को लेकर भी विवाद और कानूनी प्रक्रिया चली। उनकी APAR को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एम्स में भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दे उठाने के बाद उनके साथ हुए व्यवहार से संबंधित मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।

अब फिर क्यों चर्चा में है मामला?

फिलहाल चर्चा की मुख्य वजह CAT दिल्ली पीठ का 21 सितंबर 2026 का आदेश है। न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने चतुर्वेदी की याचिका की कुछ समय सुनवाई के बाद खुद को मामले से अलग कर लिया। आदेश में अलग होने का कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया गया और मामले को उपयुक्त पीठ के सामने सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए गए।

इस नए घटनाक्रम के बाद अलग-अलग वर्षों में सामने आए ऐसे मामलों की संख्या 17 तक पहुंचने की चर्चा है। हालांकि यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि ये 17 recusals अलग-अलग मामलों और अलग-अलग न्यायिक मंचों से संबंधित हैं…न कि सभी 17 न्यायाधीशों ने मौजूदा APAR याचिका की सुनवाई छोड़ी है।

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