अल्मोड़ा में जनसंवाद की तैयारी, रोजगार गारंटी योजना को कमजोर करने का आरोप
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि वे अल्मोड़ा जनपद के कुछ विकास खंडों में जाकर आम लोगों से सीधा संवाद करेंगे, ताकि जमीनी हकीकत सामने लाई जा सके।
हरीश रावत ने कहा कि मनरेगा हमारे स्वाभिमान का प्रतीक है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से केंद्र सरकार ने इसे “उचित तरीके से” धीरे-धीरे समाप्त कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल एक योजना को खत्म करना नहीं है, बल्कि ग्रामीण गरीब, मजदूर और पहाड़ के लोगों के सम्मान पर चोट है।
मनरेगा को 2 अक्टूबर 2009 को संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा को मजबूत करना था। इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को हर वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारंटीकृत रोजगार देने का प्रावधान किया गया, जिसमें अकुशल श्रम के लिए न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। वर्ष 2010-11 में इस योजना के लिए केंद्र सरकार ने 40,100 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था।
यह योजना केवल रोजगार तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके जरिए स्थायी परिसंपत्तियों जैसे ग्रामीण सड़कें, नहरें, तालाब, कुएँ, जल संचयन संरचनाएं, सूखा राहत और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े कार्य कराए जाते थे। कानून के तहत काम आवेदक के निवास स्थान से 5 किलोमीटर के भीतर दिया जाना था और यदि 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिला, तो बेरोजगारी भत्ता देना अनिवार्य था। यानी मनरेगा के तहत रोजगार कानूनी अधिकार था, कोई दया नहीं।
हरीश रावत ने कहा कि मनरेगा ने पहाड़ में पलायन को रोकने, गांवों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और गरीब परिवारों को सम्मान के साथ काम देने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन आज हालात यह हैं कि न काम मिल रहा है, न समय पर मजदूरी, और न ही योजना की गंभीर निगरानी।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार विकास और आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, तो फिर ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना को कमजोर क्यों किया गया? उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में वे जनसंवाद के माध्यम से इन सवालों को जनता की आवाज़ बनाकर उठाएंगे।















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