देवभूमि उत्तराखंड में शराब नीति को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसी बहस के केंद्र में नैनीताल की जिला आबकारी अधिकारी मीनाक्षी टम्टा का नाम बार-बार सामने आ रहा है। एक ओर विभागीय रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने 2014 में रामनगर क्षेत्र के थारी जंगल में छापेमारी कर चार अवैध भट्टियां पकड़ीं, आठ हजार लीटर लहन नष्ट किया और आरोपियों पर आबकारी एक्ट के तहत कार्रवाई की। दूसरी ओर, 2026 में खटीमा में जहरीली शराब से दो मौतों के बाद नैनीताल जिले की 30 दुकानों और गोदामों से 60 सैंपल लेकर जांच के लिए देहरादून लैब भेजने की पहल भी उनके नेतृत्व में हुई।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते।
2025 में पाटकोट में विदेशी मदिरा की दुकान के लाइसेंस को लेकर महिलाओं का उग्र विरोध सामने आया। आरोप था कि प्रस्तावित दुकान प्राथमिक स्कूल और मंदिर के बेहद नजदीक है। आंदोलनरत महिलाओं ने साफ कहा कि विकास कार्यों पर उनकी आवाज नहीं सुनी जाती, लेकिन शराब के ठेके के लिए फाइलें तेजी से चलती हैं। जिला आबकारी अधिकारी के तौर पर मीनाक्षी टम्टा मौके पर पहुंचीं और समझाने की कोशिश की, पर जनाक्रोश शांत नहीं हुआ।
इसी बीच चुनावी मौसम में शराब और नकदी की बढ़ती बरामदगी ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। 2017 के मुकाबले हालिया चुनावों में जब्त शराब और कैश की रकम दोगुनी से अधिक बताई जा रही है। एक तरफ महिला वोटर शराबबंदी की मांग उठा रही हैं, दूसरी तरफ चुनावी सभाओं में नशे का खुला प्रदर्शन दिखता है। ऐसे माहौल में आबकारी विभाग की भूमिका और जिम्मेदारी पर स्वाभाविक रूप से निगाहें टिकती हैं।
मीनाक्षी टम्टा के लंबे समय से एक ही जिले में तैनाती, राजनीतिक रिश्तों की चर्चा और संवेदनशील इलाकों में लाइसेंस को लेकर विवाद — ये सब मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं: क्या कार्रवाई केवल कागज़ों तक सीमित है, या ज़मीनी स्तर पर भी समान सख्ती दिखाई दे रही है?
देवभूमि में शराब नीति को लेकर जनता का धैर्य टूट रहा है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और प्रशासन पारदर्शिता व निष्पक्षता का भरोसा कैसे बहाल करते हैं — और क्या विवादों के घेरे में आए अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, या फिर सवाल यूँ ही हवा में तैरते रहेंगे।
कार्रवाई या कनेक्शन? आबकारी अधिकारी मीनाक्षी टम्टा विवादों के घेरे में















Leave a Reply