उत्तराखंड: हिमालयी फल में मिला बैक्टीरिया-फंगस से लड़ने का फॉर्मूला, उत्तराखंड के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज

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Seabuckthorn | Nanotechnology | Green |Synthesis |Manoj Prasad Tamta : हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाला औषधीय फल सी-बकथॉर्न अब स्वास्थ्यवर्धक उपयोग के साथ वैज्ञानिक शोध के लिए भी अहम साबित हो रहा है। उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने सी-बकथॉर्न के प्राकृतिक अर्क की मदद से टाइटेनियम डाइऑक्साइड के विशेष नैनो कण तैयार किए हैं। प्रयोगशाला परीक्षण में इन नैनो कणों ने बैक्टीरिया और फंगस को नष्ट करने की क्षमता दिखाई है।

इस शोध की खास बात यह है कि नैनो कण तैयार करने के लिए किसी हानिकारक रसायन का इस्तेमाल नहीं किया गया। वैज्ञानिकों ने सी-बकथॉर्न के प्राकृतिक अर्क से ग्रीन सिंथेसिस तकनीक का उपयोग किया। इससे नैनो कण बनाने की प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिली।

ई-कोलाई और कैंडिडा पर किया गया परीक्षण

शोध के दौरान तैयार नैनो कणों का ई-कोलाई और कैंडिडा एल्बिकंस जैसे सूक्ष्मजीवों पर परीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रकाश के संपर्क में आने पर ये नैनो कण सक्रिय होते है…और ऐसे मुक्त कण पैदा करते हैं, जो सूक्ष्मजीवों की कोशिकाओं और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बैक्टीरिया और फंगस को खत्म करने की क्षमता सामने आई।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे के शोध और परीक्षण सफल रहने पर इस तकनीक का इस्तेमाल अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण, रोगाणुरोधी दवाओं के विकास, चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा और पेयजल शोधन जैसी प्रणालियों में किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में मिली जगह

यह शोध राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बेरीनाग समेत राज्य के विभिन्न संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है। शोध पत्र को वेब ऑफ साइंस इंडेक्स से मान्यता प्राप्त जर्नल ऑफ माउंटेन रिसर्च में प्रकाशन के लिए स्वीकार किया गया है।

इस शोध को मनोज प्रसाद टम्टा ने डॉ. महेश चंद्र विश्वकर्मा और डॉ. बालम सिंह बिष्ट के मार्गदर्शन में किया। शोध दल में डॉ. प्रमोद सिंह खाती, डॉ. राजेश कुमार और डॉ. प्रियंका तिवारी भी शामिल रहे।

यह शोध हिमालयी जैव संपदा के वैज्ञानिक उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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