हाल ही में The Indian Express में प्रकाशित एक खबर ने उत्तराखंड की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। खबर में बताया गया है कि 2022 विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई है और संगठनात्मक स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं। लेकिन सवाल सिर्फ कांग्रेस की कमजोरी का नहीं है, बल्कि उत्तराखंड में लोकतांत्रिक संतुलन के भविष्य का भी है।
2022 के 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 37.9% वोट शेयर के साथ 19 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 44.3% वोट शेयर के साथ 47 सीटों पर जीत दर्ज की। वोट प्रतिशत के अंतर को देखें तो तस्वीर उतनी एकतरफा नहीं दिखती, जितनी सीटों के आंकड़ों से प्रतीत होती है। इसके बावजूद, चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस संगठन में ऊर्जा और एकजुटता की कमी की चर्चा लगातार होती रही है|
राज्य की राजनीति में लंबे समय तक मजबूत स्तंभ रहे पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat का प्रभाव कम होना कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। उनके अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ की बराबरी करने वाला चेहरा अभी तक स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाया है। हालांकि यह भी सच है कि किसी भी दल में पीढ़ी परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस बदलाव को अवसर में बदल पाएगी?
खबरों में यह संकेत भी दिया गया है कि मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami को विपक्ष से फिलहाल ज्यादा खतरा महसूस नहीं हो रहा। लेकिन लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना सत्ता के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करता है। अगर विपक्ष कमजोर होता है, तो सरकार पर जनमुद्दों—बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, सड़क और बुनियादी ढांचे—को लेकर दबाव भी कम होता है। ऐसे में यह स्थिति जनता के हित में नहीं कही जा सकती।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व राज्य इकाई से लगातार संवाद में है और संगठन को मजबूत करने के प्रयास जारी हैं। बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक नई रणनीति पर काम हो रहा है।
यह समय आत्ममंथन का है—क्या कांग्रेस खुद को पुनर्गठित कर एक प्रभावी विपक्ष के रूप में सामने आएगी, या उत्तराखंड की राजनीति एकतरफा होती चली जाएगी?
The Indian Express की इस रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। यह सिर्फ कांग्रेस की स्थिति का आकलन नहीं, बल्कि उत्तराखंड में लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।
राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि उत्तराखंड की जनता ने हमेशा संतुलन और जवाबदेही को महत्व दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपने संगठन को कितनी मजबूती से पुनर्जीवित कर पाती है—और भाजपा जनअपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है।
डगमगाती कांग्रेस या कमजोर होता लोकतांत्रिक संतुलन?















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