राजधानी देहरादून की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की जागी हुई चेतना का सशक्त प्रदर्शन था। “राजभवन घेराव” के दौरान हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ अपनी बुलंद आवाज उठाई।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस अवसर पर कहा कि यह संघर्ष किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि जन-जन के अधिकार और सम्मान की रक्षा का संकल्प है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की वर्तमान सरकार जनसमस्याओं से मुंह मोड़कर सत्ता के संरक्षण में अन्याय को बढ़ावा दे रही है।
राजभवन की ओर बढ़ते शांतिपूर्ण मार्च को हाथी बड़कला क्षेत्र में पुलिस प्रशासन द्वारा रोकने का प्रयास किया गया। बावजूद इसके, प्रदर्शनकारियों ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते हुए स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी और स्पष्ट संदेश दिया—
“लोकतंत्र की आवाज न दबेगी, न झुकेगी।”
हरीश रावत ने कहा कि जब जनता सड़क पर उतरती है तो सत्ता के गलियारों में हलचल स्वाभाविक है। यह जनआंदोलन उत्तराखंड की अस्मिता, स्वाभिमान और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है, युवा बेरोजगार हैं, महंगाई चरम पर है और महिलाओं की सुरक्षा सवालों के घेरे में है। सरकार विकास के दावों में व्यस्त है, जबकि आम जनता बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है।
हरीश रावत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अन्याय की दीवार टूटेगी—जनता की आवाज गूंजेगी। बदलाव अब दूर नहीं है।”
इस आंदोलन में उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा, प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री, विधायकगण, महिला कांग्रेस, यूथ कांग्रेस, NSUI और सेवादल सहित हजारों कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में राज्य सरकार से जवाबदेही की मांग की।
राजभवन तक गूंजता जनसंकल्प इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड की जनता अब चुप बैठने वाली नहीं। यह आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि परिवर्तन का महा आगाज़ है।
जय हिंद, जय भारत, जय उत्तराखंड।
जय हो — जय कांग्रेस, विजयी कांग्रेस।
इंकलाब जिंदाबाद।
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