डॉ. निर्मला सीतारमण का 9वां बजट: हरिश रावत का दृष्टिकोण
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए 9वें केंद्रीय बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरिश रावत ने इसे “भविष्य के सपनों में उलझा, लेकिन वर्तमान की ज़रूरतों से कटा हुआ बजट” बताया। उनका कहना है कि 2047 के विकसित भारत का नक्शा बनाते-बनाते यह बजट ग्रामीण भारत, कृषि और लघु उद्योगों को भूल गया है।
हरिश रावत के अनुसार इस बजट में कृषि, ग्रामीण रोजगार और छोटे उद्योगों के लिए कोई ठोस योजना नहीं दिखाई देती। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों के आवंटन में वृद्धि रक्षा और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर्स की तुलना में बहुत कम है। इससे यह साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता गांव और किसान नहीं हैं। उनका मानना है कि इससे ग्रामीण रोजगार घटेंगे और छोटे उद्योग और कमजोर होंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरी है, लेकिन रोजगार सृजन और आजीविका की उपेक्षा कर विकास संभव नहीं है। AI और नई तकनीकों की बात जरूर की गई है, लेकिन इससे सामान्य और पारंपरिक नौकरियों के खत्म होने का खतरा बढ़ेगा, जिससे बेरोजगारी और बढ़ सकती है।
हरिश रावत के अनुसार उत्तराखंड और अन्य मध्य हिमालयी राज्यों के लिए इस बजट में कोई विशेष योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि पर्यटन के नाम पर ट्रैकिंग हब की घोषणा तो की गई है, लेकिन ईको-टूरिज्म और पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी पूंजीगत निवेश पर सरकार चुप है। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि ग्रीन बोनस और कार्बन क्रेडिट जैसी योजनाओं से पहाड़ी किसानों को जोड़ा जाएगा, लेकिन बजट में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
हरिश रावत ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत ने मध्यम वर्ग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसके बावजूद बजट में न तो टैक्स राहत दी गई और न ही इन खर्चों को कम करने की कोई व्यवस्था की गई। उन्होंने कहा कि महंगाई ने पहले दी गई टैक्स राहत को भी खत्म कर दिया है, लेकिन सरकार ने इस सच्चाई को नजरअंदाज किया है।
उनके मुताबिक असंगठित मजदूरों और गिग वर्कर्स के लिए इस बजट में कोई नई योजना नहीं लाई गई। उन्होंने इसे गंभीर चूक बताते हुए कहा कि करोड़ों मजदूर आज भी सामाजिक सुरक्षा से बाहर हैं, लेकिन सरकार की विकास नीति में उनके लिए कोई जगह नहीं है।
हरिश रावत का कहना है कि यह बजट विकसित भारत की बात करता है, लेकिन आम नागरिक की समस्याओं को नजरअंदाज करता है। एक उत्तराखंड के नागरिक, मध्य हिमालयी राज्य के प्रतिनिधि और देश के सामान्य जन के रूप में यह बजट उन्हें निराश करता है। उनके अनुसार बड़े दावों और बड़े आंकड़ों के बीच आम आदमी पूरी तरह गायब है।
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