हरीश रावत बोले—“घृणा फैलाना भाजपा का एजेंडा हो सकता है, उत्तराखंड का नहीं”
उत्तराखंड के कोटद्वार में एक कपड़े की दुकान के नाम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब गंभीर राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़े कर रहा है। जो मामला आपसी बातचीत से सुलझाया जा सकता था, उसे जानबूझकर सांप्रदायिक रंग देकर प्रदेश की शांति और सौहार्द को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे भाजपा की नफरत की राजनीति करार दिया है।
हरीश रावत ने सबसे बड़ा सवाल पुलिस कार्रवाई को लेकर उठाया। उनका कहना है कि
“आखिर दीपक कुमार की गलती क्या है, जिसके लिए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई?
जिस व्यक्ति को सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसी पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया।”
उन्होंने कहा कि दीपक कुमार के खिलाफ सीधे नामजद एफआईआर और बाकी लोगों के खिलाफ केवल “अज्ञात” के नाम पर मुकदमे दर्ज होना, पुलिस-प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
“क्या प्रशासन के लिए इस तरह का रवैया अपनाना ज़रूरी था?
आज हालत यह है कि बेचारी पुलिस राजनीतिक दबाव में सच और न्याय के बीच फँसी हुई है।”
उनके अनुसार, किसी दोस्त का साथ देना अगर अपराध बना दिया जाए और उसे हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखा जाए, तो यह समाज के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
कोटद्वार मामले को लेकर हरीश रावत का सबसे सख्त बयान यही रहा कि—
“घृणा और नफरत फैलाना भाजपा का राजनीतिक एजेंडा हो सकता है,लेकिन यह उत्तराखंड का राजनीतिक एजेंडा नहीं हो सकता।”
पूर्व मुख्यमंत्री का मानना है कि चुनाव नज़दीक आते ही भाजपा ऐसे मुद्दों को जानबूझकर हवा देती है, ताकि जनता का ध्यान विकास, बेरोज़गारी और महंगाई जैसे असल मुद्दों से भटकाया जा सके।
कोटद्वार का यह विवाद अब सिर्फ एक दुकान के नाम का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल बन गया है—क्या उत्तराखंड नफरत की राजनीति का अखाड़ा बनेगा, या भाईचारे की अपनी पहचान बचाए रखेगा?
हरीश रावत के शब्दों मे“घृणा की राजनीति को उत्तराखंड की आत्मा कभी स्वीकार नहीं करेगी।”
सच के साथ खड़ा होना ही लोकतंत्र की असली पहचान है।














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